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एक बलात्कारी बाबा के आगे लाचार सत्ता तंत्र

By Pradeshsattanews :05-09-2017 07:56


किसी भी सरकार का पहला दायित्व नागरिकों के जान-माल की रक्षा करना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना होता है। पर खट्टर सरकार न सिर्फ  इस बार बल्कि इससे पहले भी कई बार बुरी तरह नाकाम साबित हुई है। जाट आरक्षण आंदोलन के समय तो जैसे सरकार नाम की कोई चीज ही नहीं बची थी। उससे पहले, 2014 में एक अन्य 'धार्मिक गुरुÓ रामपाल की गिरफ्तारी के समय भी हरियाणा सरकार की खूब किरकिरी हुई थी। लेकिन लगता नहीं कि उन कड़वे अनुभवों से खट्टर सरकार ने कोई सबक सीखा हो।  बलात्कार के मामले में सजा पाकर जेल की सलाखों के पीछे पहुंच चुके धर्मगुरु कहलाने वाले डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह के मामले ने एक बार फिर इस हकीकत को उजागर किया है कि हमारे देश में धर्म के नाम पर लोगों की आस्था का शोषण करने वाले लम्पट बाबाओं का घिनौना व्यापार किस कदर पनप रहा है और ऐसे बाबाओं को वोटों के लालची सत्ताधारियों का किस कदर संरक्षण हासिल रहता है। 

पंचकूला की सीबीआई अदालत द्बारा गुरमीत राम रहीम को दोषी ठहराए जाने के बाद बड़े पैमाने पर उपद्रव और हिंसा का जो नजारा देखने में आया और जिसके कारण लगभग 35 लोगों की जानें चली गईं, भारी पैमाने पर सरकारी और निजी संपत्ति का नुकसान हुआ, उसकी जवाबदेही से किसी भी सूरत में हरियाणा सरकार अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती। यह कोई भूकम्प या सुनामी जैसी स्थिति नहीं थी जिसके बारे में कोई पूर्वानुमान न रहा हो और मुसीबत अचानक टूट पड़ी हो। हालात की संवेदनशीलता एकदम जाहिर थी। मगर हरियाणा सरकार ने घटनाक्रम की गंभीरता को समझने में जहां अपरिपक्वता और लापरवाही दिखाई वहीं हालात को संभालने में भी वह बुरी तरह नाकाम रही। 

किसी भी सरकार का पहला दायित्व नागरिकों के जान-माल की रक्षा करना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना होता है। पर खट्टर सरकार न सिर्फ  इस बार बल्कि इससे पहले भी कई बार बुरी तरह नाकाम साबित हुई है। जाट आरक्षण आंदोलन के समय तो जैसे सरकार नाम की कोई चीज ही नहीं बची थी। उससे पहले, 2014 में एक अन्य 'धार्मिक गुरुÓ रामपाल की गिरफ्तारी के समय भी हरियाणा सरकार की खूब किरकिरी हुई थी। लेकिन लगता नहीं कि उन कड़वे अनुभवों से खट्टर सरकार ने कोई सबक सीखा हो। उसकी अदूरदर्शिता और काहिली का ही नतीजा था कि जो हालात प्रतिबंधात्मक आदेश का कड़ाई से पालन, सख्त निगरानी और पुलिस के सहारे नियंत्रित हो सकते थे वे बेकाबू हो गए। हालात को संभालने के लिए पुलिस के अलावा काफी संख्या में सीआरपीएफ तैनात करनी पड़ी। सेना भी बुलानी पड़ी। कर्फ्यू लगाना पड़ा। मोबाइल, इंटरनेट आदि सेवाएं स्थानीय तौर पर ठप करनी पड़ी।

डेरा समर्थकों की इस गुंडागर्दी के लिए खट्टर सरकार और हरियाणा पुलिस को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट की कड़ी फटकार सुननी पड़ी। हाईकोर्ट ने यह तक कह दिया कि पुलिस महानिदेशक को क्यों न बर्खास्त कर दिया जाए! इतना ही नहीं, हाईकोर्ट ने जब इस मामले में केंद्र सरकार से भी जवाबतलब किया और केंद्र सरकार के वकील ने हिंसक घटनाओं को राज्य सरकार का मामला बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की तो हाई कोर्ट को कहना पड़ा कि नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं न कि भाजपा के और उनकी भी कुछ जिम्मेदारी बनती है। हाई कोर्ट ने साफ  शब्दों में कहा कि हरियाणा की खट्टर सरकार ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए राज्य को जलने दिया और केंद्र सरकार भी मूकदर्शक बनी रही। संभवत: यह पहला मौका रहा जब किसी हाई कोर्ट ने इस तरह केंद्र सरकार को फटकार लगाई और सीधे-सीधे प्रधानमंत्री का नाम लेकर तीखी टिप्पणी की। 

 
किसी के लिए भी यह समझ पाना मुश्किल था कि धारा 144 लागू होने के बावजूद, अदालत का फैसला सुनाए जाने के लिए निर्धारित समय से अड़तालीस घंटे पहले ही कोई पचास हजार लोग पंचकूला में कैसे जमा हो गए। राज्य सरकार को अपने खुफि या तंत्र के जरिये पहले से मालूम हो चुका था कि गुरमीत राम रहीम के खिलाफ फैसला आया तो हालात बिगड़ सकते हैं। फि र भी, राज्य सरकार ने कोताही करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। फैसला सुनाए जाने की तारीख घोषित होने के बाद से ही, यानी एक हफ्ते से डेरा समर्थकों का आना लगातार जारी था। धारा 144 लागू किए जाने के बाद भी उन्हें नहीं रोका गया। और तो और सूबे के गृह मंत्री रामविलास शर्मा बेशर्मी के साथ मीडिया से कहते रहे कि धारा 144 श्रद्धालुओं पर लागू नहीं होती। नतीजा यह हुआ कि डेरा समर्थक पाकरें में जमा हो गए, सड़कों पर पसर गए। मगर पुलिस मूकदर्शक बनी रही। हिंसा फैलने पर कई जगहों से तो पुलिस के जवान भाग ही गए।

जिला प्रशासन द्वारा दो तरह के प्रतिबंधात्मक आदेश जारी किए गए थे। एक में बिना हथियार के जाने की इजाजत थी। बाद में हाईकोर्ट की फटकार लगने पर प्रतिबंधात्मक आदेश को संशोधित किया गया। लेकिन सवाल यही उठता है कि हजारों डेरा समर्थक हथियारों से लैस कैसे थे? हाईकोर्ट ने प्रदर्शनकारियों को हटाने को कहा, तो उस पर अमल करने का दिखावा भर किया गया। एक-दो जगह पुलिस अधिकारियों ने मीडियाकर्मियों के सामने डेरा समर्थकों से अपील कर दी कि वे चुपचाप अपने घरों को लौट जाएं। आखिर इतनी नरमी किसलिए बरती जा रही थी? जाहिर है, इसलिए कि खट्टर सरकार डर रही थी कि सख्ती बरतने पर उसे सियासी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

सब जानते हैं कि हरियाणा विधानसभा के पिछले चुनाव में डेरा ने भाजपा का खुलकर समर्थन किया था। डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम ने हरियाणा के अपने अनुयायियों से भाजपा को वोट देने की अपील की थी। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सिरसा गए थे और डेरा के समर्थन के एवज में उन्होंने अपनी चुनावी सभा में डेरा की तथा डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम की प्रशंसा की थी। चुनाव के बाद भाजपा की सरकार बनने पर उसके लगभग आधे विधायक, जिनमें कई मंत्री भी हैं, गुरमीत राम रहीम का शुक्रिया अदा करने डेरा पहुंचे थे। गुरमीत राम रहीम ने भी प्रधानमंत्री के स्वच्छता अभियान में मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर और उनके अन्य मंत्रियों के साथ बढ़-चढ़कर भाग लिया था। पिछली 10 अगस्त को उसके जन्मदिन के मौके पर भी राज्य सरकार के दो मंत्री डेरा पहुंचे थे और उसे अपनी सरकार की ओर से डेरा के लिए 51 लाख रुपए की राशि दान के रूप में भेंट की थी।

राज्य के मुख्यमंत्री, मंत्रियों और भाजपा के आला नेताओं के साथ अपनी नजदीकियों के चलते गुरमीत राम रहीम का सूबे के प्रशासनिक अफ सरों के बीच भी खासा दबदबा था। उसकी सिफ ारिश पर अधिकारियों के तबादले और प्रमोशन होते थे। कई मामलों में तो पुलिस और प्रशासन के आला अफसरों को वह सीधे आदेश देता था। अपने आदेश के पालन में कोताही होने पर वह अधिकारियों को हड़काता भी था। इसलिए यही माना जा रहा है कि राज्य सरकार डेरा समर्थकों के प्रति नरमी बरत रही थी। पुलिस का ढीला-ढाला रवैया भी साफ तौर पर 'ऊपरÓ से निर्देशित था।

गुरमीत राम रहीम को अदालत ने बलात्कार के मामले में दोषी ठहरा दिया, उसे बीस साल की सजा सुना दी, उसे जेल भेज दिया। लेकिन इसके बावजूद भाजपा का उससे लगाव कम नहीं हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य में हुई हिंसा के चार दिन बाद हिंसक घटनाओं पर अफ सोस जरूर जताया मगर धर्म की आड़ में गुरमीत राम रहीम द्वारा किए गए धतकर्मों की निंदा करने से साफ तौर पर परहेज बरता। ऐसे में पार्टी के बाकी नेताओं को तो खामोश रहना ही था। हां, पार्टी की ओर से बलात्कारी 'धर्मगुरुÓ के बचाव में जरूर आवाजें उठीं। पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद सुब्रमण्यम स्वामी और साक्षी महाराज ने तो गुरमीत राम रहीम को बलात्कार का दोषी मानने से ही इन्कार कर दिया तथा उसे दोषी ठहराए जाने के अदालत के फैसले पर ही सवाल खड़े कर दिए।

दोनों सांसदों ने बेहद बेशर्मी के साथ गुरमीत राम रहीम पर लगे तमाम आरोपों को हिंदुत्व को बदनाम करने की साजिश तक करार दे दिया। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने सीधे-सीधे गुरमीत राम रहीम की हिमायत तो नहीं की लेकिन राज्य में हुई हिंसा के लिए गुरमीत रहीम का फैसला सुनाने वाले जज को ही जिम्मेदार ठहरा दिया। उन्होंने कहा कि भारी संख्या में जुटे लोगों और हिंसक उपद्रव की आशंका को देखते हुए अदालत को फैसला कुछ समय के लिए टाल देना था। जाहिर है कि गुरमीत राम रहीम के दुष्कर्मों को लेकर न तो राज्य सरकार को और न ही पार्टी को किसी तरह का अफ सोस है। लेकिन अकेले भाजपा को ही दोष नहीं दिया जा सकता। कांग्रेस, इंडियन नेशनल लोकदल और अकाली दल जैसी दूसरी पार्टियां भी डेरा समर्थकों के वोट पाने की गरज से राम रहीम के आगे नतमस्तक होती रही हैं। राजनीति की इस कमजोरी, धर्म के नाम पर होने वाली गिरोहबंदी और समाज में अवैज्ञानिक सोच के फैलाव ने तथाकथित संतों और बाबाओं को इतना ताकतवर बना दिया है कि वे कानून तक की परवाह नहीं करते। यह स्थिति हमारे लोकतंत्र के लिए एक बेहद चिंताजनक संकेत है।

Source:Agency