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किस आधार पर बंटे विभाग?

By Pradeshsattanews :06-09-2017 08:04


मोदी मंत्रिमंडल में तीसरी बार फेरबदल और विस्तार हुआ है और अभी यह कहा नहीं जा सकता कि यह अंतिम फेरबदल है। अभी डेढ़ साल का सफर और तय करना है, और अगले चुनावों की तैयारी भी, तो मुमकिन है क्षेत्रीय, जातीय आधार पर एकाध बार बदलाव और हो। बहरहाल, इस बार मंत्रिमंडल का जो विस्तार हुआ है, उसमें 27 केबिनेट, 37 राज्यमंत्री और 11 स्वतंत्र प्रभार के मंत्री मिलाकर कुल 75 मंत्री मोदी सरकार के हैं। इतने मंत्रियों के साथ लगभग सभी जरूरी क्षेत्रों के कार्य-व्यापार का निष्पादन सुचारू रूप से किया जा सकता है। लेकिन हमारी राय में मंत्रालयों का बंटवारा बहुत सुविचारित या सुनियोजित तरीके से नहीं किया गया है। इसलिए कहींएक ही क्षेत्र में कई मंत्री अलग-अलग रूपों से संलग्न हैं, तो कहींएक ही मंत्री पर कई अलग-अलग क्षेत्रों का दायित्व डाल दिया गया है। प्रधानमंत्री के बाद मंत्रिमंडल में जो पांच-छह महत्वपूर्ण मंत्री हैं, उन्हें तो सोच-समझ कर मंत्रालय दिए गए हैं और वे इस जिम्मेदारी का महत्व जानते भी हैं। लेकिन क्रम जैसे-जैसे नीचे आता है, मंत्रालय विभाजन का आधार समझ नहीं आ रहा है।

 
बात शुरू करें उन मंत्रियों से जिनका कद बढ़ाया गया है। निर्मला सीतारमण को रक्षा मंत्री बनाए जाने पर यह कहा जा रहा है कि भाजपा ने महिला सशक्तिकरण का संदेश दिया है। यह सही है कि वे इंदिरा गांधी के बाद दूसरी महिला रक्षा मंत्री हैं। लेकिन यहां महिला सशक्तिकरण से ज्यादा रक्षा में निजी क्षेत्र के बढ़ते दखल का है। देश में अरसे से रक्षा क्षेत्र में होने वाले सौदों में बड़े औद्योगिक घरानों की दिलचस्पी रही है। इस वक्त रक्षा व्यापार में निजी पूंजी निवेश की कोशिशें तेजी से हो रही हैं और इसमें निर्मला सीतारमण उपयोगी साबित हो सकती हैं। इसके पहले वे वाणिज्य मंत्रालय संभाल चुकी हैं और उस दौरान विश्व व्यापार संगठन के कई कार्यक्रमों व बैठकों में हिस्सा ले चुकी हैं। लंदन की प्राइस वाटरहाउस फर्म में भी वे काम कर चुकी हैं। इस तरह वैश्विक पूंजीवाद से उनका पुराना परिचय है और रक्षा क्षेत्र के निजीकरण में इसका लाभ मिलेगा। कमोबेश यही स्थिति रेल मंत्रालय की है। सुरेश प्रभु के बाद पीयूष गोयल को यह जिम्मा दिया गया है। वे कोयला और रेल मंत्रालय एक साथ संभालेंगे और दोनों में निजी पूंजी के लिए संभावनाओं के दरवाजे खुले हैं। पहले पीयूष गोयल उर्जा मंत्रालय देख रहे थे, अब इसका स्वतंत्र प्रभाव राज्यमंत्री आर.के. सिंह को दिया गया है। हरदीप पुरी को शहरी विकास मंत्रालय दिया गया है, जो पहले वेंकैया नायडू संभाल रहे थे। मोदी सरकार का स्मार्ट सिटी का ड्रीम प्रोजेक्ट इसी के अंतर्गत आता है। नितिन गडकरी सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री तथा नौवहन मंत्री होने के साथ-साथ जल संसाधन मंत्री भी हैं और उमा भारती से नदी विकास और गंगा कायाकल्प का कार्यभार भी उन्हें दिया गया है। जबकि सुश्री भारती पेयजल और स्वच्छता मंत्री हैं। क्या पेयजल को जल संसाधन से अलग करना उचित है? एस.एस. अहलूवालिया और रमेश चंदप्पा जिगाजीनागी पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं। जबकि अर्जुन राम मेघवाल और सत्यपाल सिंह जलसंसाधन और गंगा कायाकल्प में राज्य मंत्री हैं। इस तरह अकेले पानी पर छह मंत्री हैं। इससे देश में जलप्रबंधन सुलझेगा या और उलझेगा यह विचारणीय है। इसी तरह कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय में केन्द्रीय मंत्री राधामोहन सिंह के साथ सुश्री कृष्णा राज, पुरुषोत्तम रूपाला व गजेंद्र सिंह शेखावत ये तीन राज्यमंत्री हैं। वाणिज्य व उद्योग मंत्री सुरेश प्रभु को बनाया गया है, उनके साथ के. चौधरी राज्य मंत्री हैं। श्री चौधरी उपभोक्ता मामले, खाद्य व सार्वजनिक वितरण के भी राज्य मंत्री हैं। जबकि पी पी चौधरी कारपोरेट मामलों के राज्य मंत्री हैं और इसके केबिनेट मंत्री अरुण जेटली हैं, जिनके पास वित्त मंत्रालय भी है। वाणिज्य और उद्योग जब एकसाथ हैं तो कारपोरेट को अलग करने का क्या औचित्य है। यही स्थिति स्वास्थ्य क्षेत्र की है। जगत प्रकाश नड्डा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री हैं, उनके साथ अश्विनी चौबे और अनुप्रिया पटेल राज्य मंत्री हैं। दूसरी ओर श्रीपाद येस्सो नाईक को आयुष मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जिसमें आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी के क्षेत्र आते हैं। क्या ये सब समेकित रूप से स्वास्थ्य क्षेत्र के अंतर्गत नहींआते हैं? ऐसे में एक ही विषय के दो मंत्रालय गठित करना कितना तार्किक है? सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभाग को स्मृति ईरानी संभाल रही हैं, और वे कपड़ा मंत्री भी हैं। टेक्सटाइल का जिम्मा किसी अन्य को भी सौंपा जा सकता था। स्मृति ईरानी के साथ अजय टम्टा कपड़ा राज्य मंत्री हैं जबकि राज्यवर्द्धन सिंह राठौड़ सूचना एवं प्रसारण में राज्य मंत्री हैं और वे युवा मामले तथा खेल मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार भी संभाल रहे हैं। मंत्रालयों के ऐसे असमान वितरण में यह साफ नजर आ रहा है कि इसमें योग्यता, क्षमता और अनुभव को खास तवज्जो नहीं दी गई है, बल्कि संतुष्टीकरण पर अधिक जोर दिया गया है। इतने बड़े मंत्रिमंडल के साथ अगर विभागों का बंटवारा सोच-समझ के किया जाता तो मैक्सिमम गर्वनेंस या मिनिमम गर्वंमेंट जैसे जुमलों की जगह बेहतर गर्वनेंस और बेहतर गर्वमेंट की हकीकत सामने होती।
 

Source:Agency